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बाबूगिरी और धंधा साथ-साथ नहीं होता

-श्री अश्‍वनी लोहानी से हुई बातचीत के प्रमुख अंश

  • क्‍या सार्वजनिक उपक्रमों का उद्देश्‍य लाभ कमाना होना चाहिये?

ओवियसली, सार्वजनिक उपक्रमों का उद्देश्‍य घाटे में रहना तो नहीं हो सकता । निगम मण्‍डल एक कामर्शियल आर्गेनाइजेशन है। यदि लाभ की स्थिति में निगम मंडल हैं तभी वह अपना जो दायित्‍व है वह सही ढंग से निभा पायेगाा।
 

  • निगम मंडलों के गठन की मूल अवधारणा समग्र विकास की थी। यदि लाभ कमाना उद्देश्‍य रखा तो विकास कहीं पीछे नहीं छूट जायेगा?

इसके दो मुद्दे हैं। एक तो इस तरह का निगम मंडल हो सकता हैं  जिसको सरकार पैसा देती है कुछ स्‍पेसिफिक काम करने के लिये। इस तरह के निगम भी हैं देश में। उनको स्पेशल पर्पजव्हीकल बोला जाता है। शासन ने पैसा दिया। रेल विकास निगम लिमिटेड, इसी तरह के निगम हैं जिसको भारत सरकार पैसा देती है। और उससे वह प्रोजेक्ट एक्सीक्यूट करता है। दूसरे प्रकार के निगम वे होते हैं जो कामर्शियल आर्गेनाइजेशन को रन करते हैं जैसे म.प्र. राज्य पर्यटन विकास निगम हो गया, वेयर हाउसिंग कारपोरेशन और ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन आदि। इनके भी उद्देश्य दो हैं। एक- अधोसंरचना का विकास करें। लेकिन वो विकास करने के लिये या उस विकास को कर पाने के लिये निगम को प्रोफिट की स्थिति में होना आवश्यक है। जैसे मध्‍यप्रदेश का टूरिज्म कारपोरेशन है। इतने घाटे की स्थिति में था कि न तो अपने स्टाफ को सेलरी दे पाता था,पर्यटन विकास तो दूर की बात है, सोच भी नहीं सकता था। अब मैं इस हालत में हूं कि मैं पर्यटन विकास अपने पैसे से करने में सक्षम हूं। तो निगम मंडलों को लाभ की स्थिति में तो हर हालत में होना ही पड़ेगा। उतना मैनेजमेंट इनपुट तो देना ही अदरवाइज, कोई भी पर्पज हल नहीं होगा।
 

  • आपने लाभ कमाने की बात की। ऐसी स्थिति में, क्या निगम मंडलों को निर्णय लेने की ठीक वैसी ही स्वतंत्रता देनी चाहिये जो कि निजी क्षेत्र के प्रबंधन को उपलब्ध है?

या तो धंधा करिये या बाबूगिरी करिये। दोनों चीजें नहीं हो सकतीं। ये बात स्पष्ट होना चाहिये कि बाबूगिरी और धंधा साथ-साथ नहीं होता। धंधा करना है तो धंधे को कामर्शियल ढंग से ही चलाना पड़ेगा। कारपोरेट गवर्नेस लागू करनी ही पड़ेगी।
 

  • प्रचलित व्यवस्था यह है कि निगम मंडलों के लेखों का ए.जी. ऑडिट, वैधानिक अंकेक्षण का ऑडिट होते हैं। लंबित पैराज कोपु में भी डिसकस होते हैं। यदि जैसा कि आपने कहा निगम मंडल प्रबंधन को निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी गई लेकिन अंकेक्षण में आपत्तियां हो सकती हैं। इस स्थिति से कैसे निपटें? 

मेरा यह मानना है कि अगर आप परफॉरमेंस बहुत अच्छी देते हैं तो ये जो ऑडिट है। ये सब व्यवस्थाएं जो हैं वे सभी यह देखती हैं कि काम सही ढंग से हो रहा है अथवा नहीं हो रहा। उसका असली प्रूफ है उसकी बैलेंस शीट। तो अगर आप अच्छा काम करते हैं तो मुझे नहीं लगता कि आपको ऑडिट अथवा किसी और विभाग से प्रोब्लम हो सकती है। क्योंकि उद्देश्य आप हासिल कर रहे हैं।
 

  • मध्यप्रदेश के वे निगम मंडल जो हानि में चल रहे हैं, उन्हें अत्यंत हेय दृष्टि से  देखा जाता है। उनकी उपेक्षा सामान्य बात है। क्या यह स्थिति ठीक है? 

जो हानि में चल रहे हैं उनको इस दृष्टि से देखा जाये कि इनको प्रोफिट में लाया जा सकता है। उन निगमों में पोटेंशियल है। जो निगम हान‍ि में चल रहे है उन निगमों में पोटेंशियल हैं। जैसे -हम बोलते हैं कि म.प्र. पर्यटन के विकास की असीम संभावनाएं हैं। या हिन्‍दुस्‍तान को सोने की चिड़िया फिर से बनाया जा सकता है। इसकी असीम संभवनाएं हैं। उसका मतलब यह होता है उसमें अब तक इनपुट नहीं दिया गया। इनपुट दिया जायेगा, तो बहूत कुछ वो कर सकता है। उन निगमों को उस तरह से देखना चाहिये।हेय दृष्टि से नहीं। इस तरह से देखना चाहिये कि वे गोल्‍ड माइन है जिन्‍हें एक्‍सप्‍लोर नहीं किया गया, यदि किया गया तो राज्‍य के विकास में बहुत सहायक सिद्ध होंगे।
 

  • वर्तमान में सार्वजनिक उपक्रमों की राज्‍य के विकास में भूमिका को आप कैसे देखते हैं?

देखिये, सार्वजनिक उपक्रम का विकास में योगदान होना नितांत आवश्यक है। क्योंकि यदि शुद्ध धंधा करना होता तो सार्वजनिक उपक्रम स्थापित करने की आवश्यकता ही नहीं थी। वो प्रायवेट सेक्टर कर लेता। शुद्ध धंधे की बात भी करते हैं तो भी कई स्थान ऐसे होते हैं जहांपर प्रायवेट सेक्टर नहीं आयेगा क्योंकि प्रायवेट सेक्टर की सोच नितांत कामर्शियल होती है। इसलिये पब्लिक सेक्टर स्थापित किये गये। जैसे होटल्स में भी पब्लिक सेक्टर इसलिये लाया गया क्योंकि इंटीरियर में पब्लिक सेक्टर नहीं जायेगा। दूसरी चीज यह कि, पब्लिक सेक्टर अच्छे से परफॉरमेंस करता है तो प्रोफिट कमाता है। अच्छी सर्विस भी कोई कारपोरेशन तभी दे सकता है, जब वह प्रोफिट में हो। तो प्रोफिट को वो इनवेस्‍ट कर सकता है।
 

  • म.प्र. में आपने काफी समय गुजारा है। यहां के निगम मंडलों को देखा है। क्या आप महसूस करते हैं कि यहां के निगम-मंडल अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल रहे हैं?

मुझे नहीं लगता। मुझे इसी (पर्यटन निगम) एक निगम मंडल का एक्‍सपीरियेंस है और एक को मैंने बंद होते देखा है। जब हमने टूरिज्म कारपोरेशन ज्वाइन किया था उस समय यह बहुत ज्यादा घाटे में था और ये घाटा दिखता था। सड़े हुए होटल्स, मुरझाये हुये चेहरे। तो वैसा निगम कैसे विकास में सहायता कर सकता है, ये मैं समझ नहीं सकता हूँ। ये मेरी समझ के परे है। पहिले तो उन्हें खुद सक्षम होना पड़ेगा। म.प्र. के निगम- मंडलों में पोटेंशियल बहुत ज्यादा है, बहुत ज्यादा विकास में सहयोग दे सकते हैं लेकिन इनको कॉमर्शियली और कारपोरेट गर्वनेंस को ध्यान में रखकर चलाने की आवश्यकता है। कार्पोरेट गवर्नेंस इनमें लागू करनी पड़ेगी। कार्पोरेट गवर्नेंस स्पिरिट में लागू करनी पड़ेगी। ये सरकार के विभाग नहीं हैं। इनको विभागों की तरह नहीं चलाना है।
 

  • जैसा आपने कहा कि म.प्र. के निगम मंडल अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो सके हैं। इसके लिये आप सबसे ज्यादा जिम्मेदार किसे मानते हैं?

मैं तो कहूंगा कि कोई भी निगम मंडल जो ठीक से काम नहीं करता तो उसका जो सीईओ है जो उसका मैनेजिंग डायरेक्टर है, वह जिम्मेदार है। सीईओ हमेशा निगम मंडल का मैनेजिंग डायरेक्टर ही होता है। सारे पावर उसके हाथ में हैं। उसे चलाने की जबाबदारी भी उसी की है। जिम्मेदारी सिर्फ एक आदमी के ऊपर आकर टिकती है और वह होता है उसका सीईओ या मैनेजिंग डायरेक्टर।
 

  • मध्यप्रदेश में एक दो निगम मंडल को छोड़कर सभी में आय.ए.एस. अधिकारी सीईओ के रूप में काम कर रहे हैं। कमोबेश ये धारणा प्रवल होती चली गई है कि आय.ए.एस. अधिकारी ही निगम मंडलो को अच्‍छी तरह चला सकते है। हालांकि आपने इस धारणा को गलत साबित किया है क्या कहना चाहेंगे?

मैं इस पर कोई टिप्पणी करना नहीं चाहता। मैं यह कहना चाहूंगा कि सी. ई. ओ. की जिम्मेदारी है कि वह निगम मंडल को आसमान पर ले जाये या चाहे तो फुटपाथ पर ।
 

  • म.प्र. के निगम मंडलों को बदहाली की हालत से कैसे बाहर निकालें?

देखिये, एक तो ये बिल्कुल क्लीयर होना चाहिये कि निगम मंडल को ढंग से चलाना है। दूसरी चीज ये मान के चलना है कि बाबूगिरी और धंधा साथ-साथ नहीं हो सकते। आप एक अच्छा सीईओ पोस्ट कीजिये, उसको क्लीयर डायरेक्शन दीजिये। क्लीयर रिसपोंसिबिल्टी दीजिये, क्लीयर अथॉरिटी दीजिये। अकाउंटेबल ठहराइये। सब ठीक हो जायेगा। ये मान के चलना पड़ेगा कि निगम मंडल प्रायवेट सेक्टर की तरह लाभ में चल सकते हैं। ये आपको मानना ही पड़ेगा। यदि आप ये नहीं मानते तो आप नहीं कर पायेंगे। कोई भी पब्लिक सेक्टर प्रायवेट सेक्टर की तरह काम कर सकते हैं।
 

  •  सी.ई.ओ. की पदस्थापना में प्रबंधकीय योग्यता का ध्यान रखा जाना चाहिये अथवा नहीं?

यह मेरे कार्यक्षेत्र से बाहर है। मैं इसमें कुछ भी नहीं बोल सकता। मैं जब आई.टी.डी.सी. का चेयरमेन बना था तब शुद्ध सरकारी अफसर था। कामर्शियल संस्था चलाने का अनुभव भी नहीं था। बस, काम करने का एक जज्बा था कि जो भी काम करेंगे, सक्सेसफुली करेंगे। बस काम करने का एक जज्बा होना चाहिये बाकी सब मैनेजमेंट प्रिंसिपल्स वगैरह आप सब पिकअप कर लेंगे।
 

  • निगम मंडल के कर्मचारियों के ऊपर हमेशा एक तलवार लटकी रहती है। पता नहीं कब कौन सा निगम बंद हो जाये। इससे कैसे मुक्ति मिले?

प्रोफिट में लाइये।
 

  • कर्मचारी इसमें अपना योगदान कैसे दें। क्योंकि उनका काम तो उन नीतियों का क्रियान्वयन करना होता है जो प्रबंधन बनाता है।

कर्मचारी तो काम कर सकते हैं। लेकिन लीडरशिप तो प्रोवाइड करनी पड़ेगी। घाटे में है सी.ई.ओ. की जिम्मेदारी प्रोफिट में है तो सी.ई.ओ. को श्रेय। धंधा हमेशा मालिक से चलता है। प्रायवेट सेक्टर में देख लोजिये।
 

  • म. प्र. के निगम मंडलों में अध्यक्ष-उपाध्यक्ष की नियुक्ति राजनैतिक होती है। कई बार ऐसा होता है कि सी.ई.ओ. का राजनैतिक पदाधिकारियों से तालमेल नहीं बैठ पाता। परिणाम स्वरूप अच्छे परिणाम नहीं आते। ऐसी स्थिति में सी.ई.ओ. को ही जिम्मेदार ठहराना कहां तक उचित है?

जैसा कि मैंने पहिले कहा, कार्पोरेट गर्वनेंस का मतलब यही होता है कि जिस आदमी को आप पूर्णतः उत्तरदायी मानते हैं उस आदमी को आपको पूर्ण अधिकार देने पड़ेंगे। ऐसा नहीं हो सकता कि उत्तरदायित्व तो उसे मिले किन्तु अधिकार न मिले। कार्पोरेट गर्वनेंस का मुख्य सिद्धांत ही यह है कि Responsibility and authority go together. आप जिसको भी सी.ई.ओ. मानते हैं चाहे सी.एम.डी. को मानते हों, चेयरमेन को मानते हों चाहे एम.डी. मानते हों उसके पास पूरी जिम्मेदारी रहेगी पूरे अधिकार रहेंगे। ये कार्पोरेट गवर्नेस का मूल सिद्धांत है। इसका यदि पालन नहीं किया जायेगा तो वो बिजनेस नहीं चलेगा।
 

  • केन्द्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों में सी.एम.डी. का कांसेप्ट है। वहां सामान्यतः सार्वजनिक उपक्रम बेहतर काम करते हैं। क्या म.प्र. में भी इसी नीति पर चलना चाहिये?

हां, ठीक बात है कि सेन्ट्रल पी.एस.यू. में सी. एम. डी. एक व्यक्ति होता है। पावर सेन्टर क्रियेट नहीं होते। इस कारण जनरली, सेन्ट्रल पी.एस.यू. स्टेट पी.एस.यू. से बेहतर काम करते हैं। ये एक लेकुना है। पर ये बहुत मेजर डिसीजन  है  इसके बारे में हम कोई कमेंट नहीं करना चाहेंगे।
 

  • क्या अध्यक्ष-उपाध्यक्षों की भी कोई जबावदेही तय होना चाहिये ?

अकाउंटेबिलिटी तो सी.ई.ओ. की ही हो सकती सी.ई.ओ. दो नहीं हो सकते। सी.ई.ओ. हमेशा एक ही होता है। ये जिम्मेदारी बंट नहीं सकती।
 

  • मध्यप्रदेश में निगम मंडलों की छवि आम जनता में बहुत खराब है। इनमें काम करने वाले कर्मचारियों और उनके परिवार पर निश्चित रूप से इसका विपरीत असर पड़ता है। नीतियां बनाने का काम प्रबंधन का है। कर्मचारियों को तो उसका क्रियान्वयन करना है। दरअसल कर्मचारी प्रताड़ित रहते हैं जिसके लिये वे दोषी नहीं हैं। इस छवि को कैसे सुधारा जाये?

काम करके। निगम मंडलों को ढंग से चलाके। हम टूरिज्म कार्पोरेशन की कोई छवि नहीं बना रहे हैं। छवि बन रही है। हम काम कर रहे हैं शुद्ध। खुले मन से काम करें, डिलीवर करें। अच्छी छवि अपने आप बनेगी। ओ.एन.जी.सी. की छवि इतनी इच्छी है वहीं नेशनल टेक्सटाइल कार्पोरेशन की छवि बिल्कुल कचरा है। छवि तो काम पर निर्भर होती है।
 

  •  जो निगम मण्डल अच्छा काम कर रहे हैं उनके कामों का पर्याप्‍त प्रचार प्रसार नहीं होता। क्या निगम मंडलों के कामों के प्रचार प्रसार के लिये कोई नीति बनानी चाहिये?

मुझे नहीं लगता कि प्रचार प्रसार की आवश्यकता है। यदि आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं तो प्रचार प्रसार अपने आप होता है। कोई नीति बनाने को आवश्यकता नहीं है। प्रचार प्रसार उ‌द्देश्य नहीं होना चाहिये। उद्देश्य तो लक्ष्य प्राप्ति होना चाहिये। प्रचार प्रसार तो इसका वायप्रोडक्ट है।
 

  • सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण के बारे में आपकी क्या राय है?

मेरा तो यह मानना है ये मेरी पर्सनल राय है, मेरा ये मानना है कि पब्लिक सेक्टर में और प्रायवेट सेक्टर में फर्क सिर्फ मिल्कियत का होता है। अगर आप ऐसे अफसरों को लगा दें जो उस आर्गेनाइजेशन को अपनी मिलकियत समझें अपना खुद का धंधा समझें। उस आर्गेनाइजेशन और प्रायवेट सेक्टर में कोई फर्क नहीं रहेगा। सिर्फ एक सोच की बात है। मैं एम.पी. टूरिज्म कार्पोरेशन को अपना बिजनेस मानता हूं। मैं इसे अपने बिजनेस की तरह चला रहा हूं तो इसकी सर्विस प्रायवेट सेक्टर की तरह होगी। इसका रेवेन्यू प्रायवेट की तरह आयेगा। मेरा यह मानना है कि पब्लिक सेक्टर को भी एफिशियेंटली चला सकते हैं।
 

  • आप मानते हैं कि सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण की कोई आवश्यकता नहीं है?

निजीकरण के परिणाम हमारे देश में अच्छे नहीं रहे हैं। अगर आप ब्रिटेन की बात करें, पहिले ब्रिटिश रेल्वेज का प्रायवेटाइजेशन हुआ था जिसे बाद में डी-प्रायवेटाइजेशन करना पड़ा। निजीकरण में बहुत सोच समझ के जाना चाहिये। कंपनीज के मेमोरेण्डम ऑफ एसोसियेशन तथा आर्टिकल्स आफ एसोसियेशन में इतनी छूट है कि पब्लिक सेक्टर भी प्रायवेट सेक्टर की तरह चल सकता है। यदि पब्लिक सेक्टर प्रायवेट सेक्टर की तरह चलेगा तो जो प्रोफिट मिलेगा उसकी प्रोपर्टी कहीं इनवेस्ट कर सकते हैं। लेकिन मूल मुद्दा यह है कि क्या आप कंपनीज एक्ट और मेमोरण्डम और आर्टीकल ऑफ एसोसियेशन को पूरा स्पिरिट से फालो करना चाहते हैं। जिस स्पिरिट से पब्लिक सेक्टर देश में बनाया गया था उस स्पिरिट से अगर चलाइये पब्लिक सेक्टर को तो पब्लिक सेक्टर प्रायवेट सेक्टर की तरह चल सकता है और उससे बेहतर चल सकता है। क्योंकि अगर धंधा करने लगे तो मेरे पीछे शासकीय ताकत भी तो है वह मिला के अनबीटेवल हो जाती है। तो पब्लिक सेक्टर बहुत अच्छे ढंग से चलाया जा सकता है। ये मेरा मानना है। मैं कोई निजीकरण का सपोर्टर नहीं हूं।
 

  • कुछ लोगों का मानना है कि सार्वजनिक उपक्रमों को बंद ही कर देना चाहिये। आपका क्या मत है?

क्रियेएट करना बहुत मुश्किल है खत्म करना बहुत आसान। तो हम लोग सरल रास्ता अपनाना चाहते हैं क्योंकि हम लोगों की मानसिकता ही सरल रास्‍ता चुनने की होती है। सरल रास्ता क्या- बेच दो। करके दिखाओ न! क्रियेएट करने दिखाओ। चला के दिखाओ। वो डिफिकल्ट रास्ता है इसलिये डिफिकल्ट रास्ता लोग अपनाना नहीं चाहते। और बेचना भी  इतना आसान नहीं होता अगर आप बेचने के हिन्दुस्तान के एक्सपीरिमेंट को ही लें तो आपको बहुत सुखद अनुभूति नहीं होगी।
 

  • निजीकरण के पक्षधर संचार का उदाहरण बड़े जोर शोर से देते हैं...

संचार में उन्होंने बेचा नहीं है। ओपन किया सेक्टर को। संचार सेक्टर को बेचना और ओपन करना अलग-अलग बातें हैं। म.प्र. पर्यटन निगम के मामले में भी यही बात है।
 

  • उपक्रम पत्रिका को और अधिक उपयोगी बनाने के लिये क्या सुझाव देंगे?

सेमीनार तथा कार्यशालाओं का आयोजन कर सार्वजनिक उपक्रमों की स्थिति पर चर्चा करायी जा चाहिये।