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हमारे प्रबन्धन गुरु - श्री हनुमान जी

- डॉ. दीप कुमारी सिंह

 

जीवन को निरन्तर अबाध गति से दिशापूर्ण प्रगति के साथ जीने के लिए उसका कुशल प्रबन्धन अत्यावश्यक है। प्रबन्धन, चाहे कारोबार का हो या व्‍यक्तिगत जीवनशैली का, हमें ऊर्ध्वगति प्रदान करता है। प्रबन्धन आज युग की माँग बन गया है।

जीवन के हर क्षेत्र में कुशल प्रबन्धन के लिए आज अनगिनत पुस्तकें बाजार में आ रही हैं, अनगिनत गुरू सफलता के सूत्रों का बखान कर रहे हैं प्रगति और प्रतिस्पर्धा की दौड़ में कितने ही मैनेजमेन्ट कोर्स चलाये जा रहे हैं। कोई बेहतर जीवन जीने की कला के लिए हजारों रूपये व्यय करके मोटी-मोटी पुस्तकें खरीद रहा है तो कोई बेस्ट सेलर पुस्तकें लेकर बाजार में छा रहा है। यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि सफलता की चाह में मनुष्य ने अपने जीवन को, अपने कैरियर को, अपने व्यवसाय को मँहगे दामों वाली पुस्तकों या मैनेजमेन्ट कक्षाओं के हवाले कर दिया है लेकिन हमने शायद सोचा ही नहीं कि मैनेजमेन्ट पर विश्व का सर्वोत्कृष्ट साहित्य हमारे पास उपलब्ध है-वह है- श्री हनुमान चालीसा और विश्व का श्रेष्ठतम गुरू हमारे पास उपलब्ध है-वह है- हमारे, हम सबके आराध्य श्री हनुमान जी । श्री हनुमान चालीसा में श्री हनुमान जी की सत्ता, श्री हनुमान जी का जीवन हमें विश्व के प्रबन्धन साहित्य की तुलना में न्यूनतम मूल्य पर सफलता के वे अकाट्य सूत्र बताता है जिन्होंने जीवन में असफलता का स्वाद ही नहीं चखा। विश्व का एकमात्र गुरू जिसके जीवन में असफलता कभी आई ही नहीं। श्री हनुमान चालीसा की चालीस चौपाइयॉ प्रवन्धन साहित्य की अनमोल धरोहर हैं। टाइम मैनेजमेन्ट, इवेन्ट मैनेजमेंट, ऑफिस मैनेजमेन्ट क्या नहीं है इन चौपाइयों में।

आइए, देखें श्री हनुमान जी का प्रवन्धन श्री हनुमान चालीसा की चुनी हुई चौपाइयों में-

 

"जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥"

'व्यक्ति को कैसा होना चाहिए-ज्ञान और गुण का सागर होना चाहिए और होना चाहिए अपनी विशेषताओं के कारण जग-विख्यात।' पहली ही चौपाई जीवन को सफल बनाने का पहला मंत्र देती है कि आप श्री हनुमान जी की तरह ज्ञान और गुण के सागर बनिए तभी आपको लोग पूछेंगे, आप अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर सकेंगे। जीवन की पहली आवश्यकता गुणवत्तापूर्ण शिक्षा है। अद्भुत सूत्र है-श्री हनुमान जी के चरित्र से प्रतिपादित होता हुआ।

 

'रामदूत अतुलित बल धामा।

अंजनि पुत्र पवन सुत नामा ॥'

श्री हनुमान जी श्रीराम के दूत हैं, उनके पास अतुल्य बल है, वे माँ अंजनी के पुत्र हैं और 'पवनसुत' उनका नाम है। व्यक्ति जिसके भी नियोजन में कार्य करे उसके नाम को रोशन करे, लोग उसे उसके नियोक्ता का कर्मचारी समझे और साथ ही वह अपने बल पौरुष के साथ अपने माता-पिता के नाम को भी रोशन करे। कितनी ऊँची शिक्षा है-जीवन प्रबन्धन की। व्यक्ति अपने कार्यों से अपने गुणों से अपने माँ-बाप, अपने नियोक्ता सबकी ख्याति दूर-दूर तक फैलाने वाला होना चाहिए। हनुमान जी अपने परम पूज्‍य श्रीराम के कार्य को सम्पादित करने वाले स्‍टार लीडर थे। 'मैनेजमेंट' का कितना अधुनातन सूत्र मिलता है- उनके जीवन से।

 

'महावीर विक्रम बजरंगी।

कुमति निवार सुमति के संगी ।।

वीर तो बहुत हैं लेकिन हनुमान जी तो महावीर थे। जो दानवीरों, दयावीरों और धर्मवीरों-चारों वीरों में वीर हो -वह होता है-महावीर। व्यक्ति को मानसिक रूप से महावीर होना चाहिए और शारीरिक रूप में भी श्री हनुमान जी की तरह मजबूत शरीर वाला (बजरंगी) होना चाहिए क्योंकि मन और शरीर दोनों के संतुलित विकास से ही सफल व्यक्तित्व प्राप्त होता है। किसी भी संगठन के लिए उपयोगी व्यक्ति वह होता है जो बुराइयों (खामियों) का निवारण करते हुए अच्छी बुद्धि वालों को बढ़ावा दे। श्री हनुमान जी राह में आने वाली हर बुराई को जड़ से मिटाते हुए सन्मित्रों को साथ लेकर चलते थे। अपने नियोक्ता श्रीराम के कार्य (सीता की खोज) में रास्ते में जो-जो बाधाएं आईं उनको दूर किया और अच्छे लोगों (विभीषण आदि) के सहयोगी बने।

 

"कंचन वरन विराज सुबेसा।

कानन कुण्डल कुंचित केसा ।।"

श्री हनुमान जी एक 'सम्पूर्ण मनुष्य' के रूप में सदैव श्रीराम के कार्यों का निष्पादन करते थे। आज प्रबन्धन में एक 'सम्पूर्ण मनुष्य' ही कारपोरेट कार्यालयों की सबसे बड़ी पूँजी है। अच्छी तरह से ड्रेस अप होकर, यूनीफार्म में अच्छे शरीर अच्छी Appearance के साथ कार्यालय आने वालों की ही जरूरत होती है MNCs में। आज उन्हीं की पूछ है जो अपनी समग्रता के साथ नियोक्ता के कार्यों को निपटाये। श्री हनुमान जी कंचन वर्ण के, कुंडलधारी, घुँघराले वालों वाले एक व्यवस्थित शारीरिक उपस्थिति के साथ श्रीराम जी के कार्य सम्पादित करते थे। कितनी सटीक प्रबन्धन सीख है- यह। आज के युग की मांग है-एक पूर्णतः व्यवस्थित व्यक्ति।

 

'हाथ वज्र औ ध्वजा विराजे।

 काँधे मूँज जनेऊ साजे ।॥'

श्री हनुमान जी के हाथों में बज्र और ध्वजा तथा कंधे पर मूँज का जनेऊ है। अपने कार्यों को सम्पादित करने के लिए वज्र हाथ में है, घ्‍वजा हाथ में है। न केवल सौन्दर्यपूर्ण उपस्थिति के लिए, बल्कि अपने स्वामी श्रीराम के कार्यों सम्पादित करने के लिए। 'न्यूनतम साधन - अधिकतम परिणाम ।' यही है अनुपम प्रबन्धन। मात्र इसी साज-सज्जा के साथ अपने स्वामी श्रीराम के कठिनतम कार्यों को सम्पादित किया। सफलता का अनुपम सूत्र है-हमारे जितने संसाधन हों उनमें से ही अधिकतम निष्पादन दें हम।

 

' विद्यावान गुनी अति चातुर।

राम काज करिबै को आतुर ।।'

श्री हनुमान विद्यावान होने के साथ गुणी और चतुर भी है और श्रीराम के कार्यों को सम्पादित करने को सदैव तत्पर। आज के युग में जहाँ हर तरफ होड़ ही होड़ है- आगे बढ़ने की-केवल विषयज्ञान से काम नहीं चलना, दौड़ में आगे बढ़ने के लिए Knowledge के साथ Tactful भी होना जरूरी है। दुर्गुणों से दूर रहने वाला ज्ञानी व्यक्ति ही अपने नियोक्ता के लिए फायदेमंद होता है। Positive Personality का कितना उत्कृष्ट उदाहरण है-श्री हनुमान जी का चरित्र। आज सेवा का मानदण्ड केवल अच्छी-अच्छी डिग्रियाँ नहीं बल्कि व्यावहारिक कुशलता, आगे बढ़ने की ललक व समर्पण भी है। प्रबन्धन की उत्कृष्टता है यहाँ। व्यक्ति बहुत बड़ी डिग्रियों के साथ नौकरी में आ जाए लेकिन यदि केवल नौकरी पाना ही अपना लक्ष्य बना ले तो वह भी नियोक्ता के लिए उपयोगी नहीं होता जब तक कि वह हर क्षण कार्यों हेतु तत्पर न रहे।

 

'प्रभु चरित सुनिवै को रसिया।

राम लखन सीता मन बसिया ।।'

कितनी 'राइट अप्रोच' है श्री हनुमान जी की। अपने स्वामी के चरित्र का सुनना, उसका गुणगान करना और अपने कार्यों के द्वारा उनके मन में बस जाना। आज के कार्पोरेट जगत को ऐसे ही लोगों की माँग है। आप जिस भी कम्पनी, कार्यालय में कार्य करें उसके 'ब्रांड अम्बेसडर' बनें। लोग आपके माध्यम से आपकी कम्पनी को जानें। आप वाहक हों-अपने नियोक्‍ता के 'विजन' के। आपकी छवि कम्पनी के उच्चाधिकारियो के बीच बने-ऐसी सीख कौन दे सकता है-श्री हनुमान जी के अलावा।

 

'सुक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा ।

विकट रूप धरि लंक जरावा ॥'

आज कारपोरेट मैनेजमेन्ट है -Think global, act local श्रीराम के कार्यों के सम्पादित करने वाले श्री हनुमान जी सीता जी को पाने के लिए कैसे जाते हैं, कहाँ-कहाँ जाते हैं लेकिन लंका पहुंचकर वहाँ जो जरूरी होता है वह कर देते हैं अर्थात लंका जाकर समय की माँग के अनुसार लंका को जला डालते हैं। श्री हनुमान जी जरूरत के हिसाब से अपने रूप को बदलते हैं । कितनी  Dynamic Personality  हैं हनुमान जी। जब जैसी जरूरत-वैसा ही रोल। कितनी उच्च प्रबन्धन की शिक्षा है श्री हनुमान जी के चरित्र में। 'विनम्रता' और 'उग्रता' दोनों का समय की माँग के अनुसार प्रदर्शन।

 

'भीमरूप धरि असुर संहारे।

श्रीराम के काज सँवारे ॥'

Identity Crisis के युग में अपनी पहचान बनाना-अपने छिपे हुए गुणों के साथ-यही आज की माँग है। अपने नियोक्ता, अपने स्वामी श्रीराम के कार्यों के सम्पादन हेतु विशालकाय शरीर को धरकर असुरों का बध कर डाला और फिर छोटे होकर वापस श्री हनुमान। कहने का तात्पर्य यह कि पद की गरिमा तभी है जब आप अपने पद से ऊँचे लक्ष्यों को सम्पादित कर लें और अभिमान आपको छूने न पावे। जरूरत पड़ने पर नियोक्ता के कठिन से कठिन कार्यों को पद की परवाह न करते हुए सम्पादित कर लें।

 

'लाय सजीवन लखन जियाये

श्री रघुवीर हरसि उर लाये ॥'

एक ऐसी घटना जिसमें श्री हनुमान अपने स्वामी श्रीराम के भाई श्री लक्ष्मण के जीवन की रक्षा संजीवनी बूटी लाकर करते हैं और श्रीराम जी उन्हें गले लगा लेते हैं। अप्रतिम उदाहरण है-'कर्मचारी नियोक्ता प्रबन्धन का।' कर्मचारी अपने नियोक्ता के असम्भव कार्य को कर देता है तो नियोक्ता की आँखों का तारा बन जाता है और उसकी 'निकटता' पा लेता है। 'निकटता यानि पुरस्कार।' कृपा का प्रसाद। बड़ों का सानिध्य। एक बड़ी उपलब्धि। कितना विराट है-श्री हनुमान जी का चरित्र। कितनी अद्भुत शिक्षा है-प्रबन्धन की ॥

 

'रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।'

अपने नियोक्ता के असंभव कार्य कर देने पर आपको प्रशंसा मिलती है और ऊँचा पद मिलता है। जैसे श्री हनुमान जी भरत के समान भाई की पदवी पा जाते हैं। अर्थात् उत्कृष्ट कार्य करने पर कई पायदान ऊपर की पदोन्नतियाँ भी सम्भव हो जाती हैं।

 

'सहस बदन तुम्हरो जस गावें।

अस कहि श्रीपति कंठ लगावें ॥'

श्रीरामजी के कार्यों का सम्‍पादन करने वाले श्री हनुमान जी का गुणगान श्री शेषनाग जी कर रहे हैं-पाताल लोक तक उनकी ख्‍याति पहुँच रही है और स्‍वामी श्रीराम विह्रल होकर उन्‍हें गले लगा रहे हैं। कितनी ऊँची शिक्षा है- प्रबन्‍धन की कि आपके कार्यों से ही आपका यश, आपकी कीर्ति देश, दुनिया में फैलती है और आप अपने नियोक्‍ता के ह्रदय में बस जाते हैं। निष्‍काम कर्म व्‍यक्ति के व्‍यक्तिव को अपरिमित ऊँचाइयाँ प्रदान करता है।

व्‍यक्तित्व विकास' पर उपलब्ध अनमोल साहित्य है-श्री हनुमान चालीसा और अनमोल प्रबंधन का दर्पण है-श्री हनुमान जी का सम्पूर्ण चरित्र। अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले श्री हनुमान का यशोगान कहाँ-कहाँ नहीं हो रहा।

 

'सनकादि ब्रह्मादि मुनीसा।

नारद सारद सहित अहीसा ॥

जग कुबेर दिगपाल जहाँ ते।

कवि कोविद कहि सके कहाँ ते ।।'

आपकी क्षमताएं, आपकी योग्यता, आपकी कार्यशैली ऐसी हो कि चारों दिशाओं और धरती, अम्बर सभी जगह आपका नाम हो। आपका व्यक्तित्व नगर, प्रान्त और देश की सीमाएं लॉघकर 'वैश्विक' हो जाए। वैश्विक उदारीकरण के वर्तमान परिदृश्य में ऐसे ही (श्री हनुमान जी जैसे) व्यक्तित्व की जरूरत है। सनकादिक मुनिगण, ब्रह्मादि देवगण, नारद, शारदा, शेषनाग, यम, कुबेर, दिशापाल सभी उनकी योग्यता का बखान कर रहे हैं।

एक कुशल प्रबंधक के रूप में हनुमान जी का व्यक्तित्व देखिए-'तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राजपद दीन्हा ॥' तुमने सुग्रीव पर कितना उपकार किया। भाई बलि की प्रताड़ना से भयग्रस्त सुग्रीव को श्रीराम से मिलाकर उन्हें निर्भय किया और ज्ञान, भक्ति तथा कर्मयोग की शिक्षा देते हुए उन्हें कर्मयोग में लगाकर क्रमशः राजा बनवाया। कितना विराट प्रबंधन कौशल है - किसी को भयमुक्त करके उसे कर्मयोगी बना देना (सीता की खोज में लगाना) इसके लिए उन्होंने एक कुशल रणनीतिकार की तरह साम, दाम, दण्ड और भेद जैसी नीतियों का भी सहारा लिया। प्रत्येक संगठन प्रमुख को चाहिए कि वह अपने कर्मचारियों में ज्ञान, भक्ति (समर्पण) और कर्म के प्रति लालसा जगाए ताकि उनको कार्याधार पर राजपद (उच्चपद) प्राप्त हो सके।

 

'तुम्हरो मंत्र विभीषण माना।

लंकेश्वर' भये सब जग जाना।

हे हनुमान ! आपका मंत्र पाकर विभीषण लंका के राजा बन गये-यह सारा संसार जानता है। इस प्रसंग से 'नीर-क्षीर विवेक' और निर्णयात्मक क्षमता वर्धन की शिक्षा मिलती है। श्रेष्ठ कार्यपालक वही है जो अपने कर्मचारियों में 'नीर क्षीर विवेक' की क्षमता पैदा कर सके।

 

'जुग सहस्त्र जोजन पर भानू।

लील्यौ ताहि मधुर फल जानू ।'

ज्ञान प्राप्ति की उत्कट इच्छा! हजारों मील दूर स्थित सूर्य के बारे में जानने की अभिलाषा! मीठा फल समझकर उसका स्वाद चखने की इच्छा! 'ज्ञान प्राप्ति' व नये के प्रति जिज्ञासा के लिए श्री हनुमान जी जैसा Daring होना जरूरी है। समय की मांग है कि आप अपने देश, अपने संगठन से बाहर की स्थितियों, घटनाओं के बारे में जानने की जागरुकता स्वयं में पैदा करें। उदारीकरण के युग में Daring होना सफलता का आधार है।

 

'प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।

 जलधि लाँघ गये अचरच नाहीं ॥'

असंभव को संभव कर दिखाने की अनूठी शैली श्री हनुमान जी के हर कृत्य में नजर आती है। राम नाम लिखी अंगूठी को मुंह में रखा और लाँध गये असीम महासागर। इसमें कोई आश्चर्य नहीं, अगर नियोक्ता की कृपया (श्रीराम नाम अंकित मुद्रिका) साथ में हो तो कर्मचारी की सारी Body Language ही बदल जाती है और काम कितना ही दुष्कर क्यों न हो, चुटकी में संभव हो जाता है।

 

'दुर्गम काम जगत के जेते।

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥'

है हनुमान जी। संसार में जितने भी मुश्किल काम हैं वे आपके अनुग्रह (कृपा) से आसान हो जाते हैं। गोस्वामी जी का यह अनुभूत विश्वास है क्योंकि श्री हनुमान जी का चरित्र सदा हर असंभव को संभव कर दिखाने के लिए Motivate करता है।

जीवन में सफलता पाने हेतु Motivation (प्रेरणा) भी जरूरी है। बिना प्रेरणा के आत्म विश्वास नहीं बढ़ता और आत्म विश्वास नहीं बढ़ने से इच्छा शक्ति कमजोर होती है। कमजोर इच्छा शक्ति का परिणाम भी कमजोर निष्पादन ही होता है। इसलिए जीवन में प्रेरणा अनिवार्य है। प्रेरक व्यक्तित्व संगठन की पूँजी है।

 

'राम दुआरे तुम रखवारे।

होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥'

एक ऐसा सेवक जो अपने स्वामी के द्वार का रखवाला है और अच्छे बुरे में भेद करके ही लोगों को तदनुसार प्रवेश की अनुमति देता है। इस प्रसंग की प्रबंधन सीख विश्व के किसी भी प्रबंधन साहित्य में सुलभ न होगी। कर्मचारी में चारित्रिक दृढ़ता, विवेक क्षमता नियोक्ता के प्रति अटूट निष्ठा, नियोक्ता को अवांछित तत्वों से दूर रखने की कला-आज हर संगठन को इन्हीं गुणों वाले कर्मचारियों की जरूरत है।

 

'सब कुछ लहै तुम्हारी सरना।

तुम रक्षक काहू को डर ना ॥'

एक श्रेष्ठ प्रबंधक वहीं है, श्रेष्ठ कार्यपालक वही है जिसके अधीन कर्मचारी सदा सुखी और सम्पन्न रहे तथा वह कर्मचारी हितों का रक्षक हो और कार्य करने हेतु भयमुक्त वातावरण प्रदान करे। ऐसा वातावरण ही कार्य निष्‍पादन में गुणात्‍मक वृद्धि कर सकता है। श्री हनुमान जी के शरणागत सारे देव और मानव सुखी और निर्भय थे। तभी तो सीता जी की खोज में प्राणपण से जुटे। निश्चय ही निर्भय मन Productivity बढ़ाने का आधार होता है।

 

'आपन तेज सँभारौं आपै,

 तीनों लोक हाँक ते काँपें।

भूत पिसाच निकट नहिं आवै,

महावीर जब नाम सुनावै ॥

एक अनुशासित व्यक्तित्व जिसके पास असीम शक्तियाँ हों, विजेता भाव हो, उसके अन्दर स्वयं इतना तेज होता है कि एक आवाज से सब उठ खड़े होते हैं। ऐसे सर्वगुण सम्पन्‍न व्यक्तित्व का नाम सुनते ही दुर्जन (भूत, पिशाच) भाग खड़े होते हैं। श्री हनुमान जी जब लंका गये थे तो उनके कारनामे देखकर सारे असुर इधर- उधर भाग खड़े होते थे, उनकी आवाज सुनते ही डर जाते थे-वे सभी। (ऐसे) 'रोबदार व्यक्तित्वों' से ही संगठन की सफलता की कहानियां लिखी जाती हैं, कर्महीन (आलसी) व्यक्ति या तो कार्य करना सीख जाते हैं अथवा मैदान छोड़कर भाग खड़े होते हैं।

 

'नासै रोग हरै सब पीरा।

जपत निरन्तर हनुमत बीरा ॥'

जो व्यक्ति निरन्तर श्री हनुमान जी के नाम का 'जप' करता है, उसके सारे रोग, सारी पीड़ाएं दूर हो जाती हैं। 'जप' और वह भी 'निरन्तर जप' यानि स्वयं को प्रक्रिया विशेष द्वारा Recharge करना। भारतीय साहित्य में ऊर्जा, जोश, सक्रियता, सकारात्मकता प्राप्त करने का सरल उपाय 'जप' बताया गया है। निरन्तर 'जप' से Positive Energy प्राप्त करता हुआ व्यक्ति अलभ्य (श्री प्रभु) को भी सहजता से प्राप्त कर लेता है।

आज हर बड़े संगठन में, हर बहुराष्ट्रीय कम्पनी में कर्मचारियों को रिलैक्स करने, निरन्तर रखने, ऊर्जावान बनाने, Recharge करने के लिए अनेक प्रबंधन तकनीकें प्रयुक्त की जा रही हैं लेकिन यदि हम अपने प्रेरणा-चरित्र श्री हनुमान जी के नाम का हो निरन्तर जप कर लें तो हम उन्हीं की तरह सामर्थ्यवान हो सकते हैं क्योंकि-

 

'संकट ते हनुमान छुड़ावै ।

मन क्रम वचन ध्यान जो लावै ॥'

श्री हनुमान जी ऐसे आदर्श हैं कि जो व्यक्ति मन्, बाणी और कर्म से उनका ध्‍यान करता है उसके सारे संकट वे पवन वेग से (तत्‍काल) दूर कर देते हैं। समस्‍या समाधान में अविलम्बता (Time Management) श्री हनुमान जी के व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पहलू है। आइए, हम भी श्री हनुमान जैसे श्रेष्ठ नर बनें क्योंकि 'सब पर राम तपस्वी राजा। तिनके काज सकल तुम साजा।' अपने विविधतापूर्ण व्यक्तित्व (Diversified Personality) के साथ श्री हनुमान जी अपने सक्षम स्वामी के सारे कार्यों को निष्पादित करते हैं, बिना किसी असफलता के।

 

'चारौ जुग परताप तुम्हारा।

है परसिद्ध जगत उजियारा।

साधु सन्त के तुम रखवारे।

असुर निकन्दन राम दुलारे ॥'

आपकी छवि कैसे हो? श्री हनुमान जी की तरह कि 'रहें न रहें हम, महका करेंगे।' अर्थात आप स्थान विशेष में हों अथवा न हों, सर्वत्र आपके नाम की धूम (आपके कार्यों के आधार पर) हों, आप विद्वान हों और आपकी विद्वता तथा आपके गुणों के कारण धरा अलोकित हो। हनुमान जी साधु, संतों के रक्षक हैं, असुरों के संहारक और स्वामी श्रीराम के प्रिय हैं।

'असुर निकन्दन' यानि Event Management का अप्रतिम उदाहरण। Event Management के तीन चरण हैं 1. Purpose 2. Funding 3. Result श्री हनुमान जी का Purpose स्पष्ट था-श्रीराम जी के कार्यों का निस्पादन Funding के मामले में सर्वदा मितव्ययी रहें। लंकादहन में रावण की बाती, रावण का तेल, स्वयं का और स्वामी श्रीराम का कुछ भी नहीं लगा और Result 100% अर्थात् संपूर्ण लंकादहन।

तो ऐसे बनें आप। आप असुर निकन्दन हों, साधु संत के रखवारे बनें, अर्थात् संगठन की हर जरूरत को, हर लक्ष्य को, हर Event को कम व्यय में 100% परिणाम के साथ अंजाम दें। यही है आज कार्पोरेट कार्यालयों की प्राथमिकता अन्यथा कार्य तो होंगे लेकिन अनावश्यक अपव्यय से आर्थिक मन्दी जैसी स्थितियां सामने आयेंगी।

तुलसीदास जी की श्री हनुमान चालीसा में वर्णित श्री हनुमान का चरित्र हर पल उच्चस्तरीय और अनुपम प्रबंधन की शिक्षा देता है। स्वामी और सेवक के बीच का रिश्ता (भाव), असंभव को संभव बनाने की कला, व्यक्तित्व विकास के नायाब नुस्खे, वैश्विक पहचान बनाते हुए विजन निर्धारण, ऑफिस मैनेजमेंट और लाइफ मैनेजमेंट का सुन्दर मेल, प्रेरणा का अज्रस स्रोत क्या नहीं है-श्री हनुमान जी के चरित्र में। आज वैश्विक उदारीकरण और प्रतिस्पर्धा के युग में यदि प्रबंधन के इन अचूक नुस्खों को अपनाया जाए तो सफलता स्वयं आकर द्वार खटखटायेगी-वह भी पवन वेग (श्री हनुमत कृपा सहित) से। यही कारण है कि गोस्वामी जी बार- बार श्री हनुमान जी से आग्रह करते हैं 'हे हनुमान जी।' आप इतने प्रेरक व्यक्तित्व के धनी हैं कि मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप अपने स्वामियों (श्री राम, श्री सीता जी, श्री लक्ष्मण) सहित मेरे हृदय में डेरा डाल दें, मुझे निरन्तर कर्मयोगी बनाकर मेरे जीवन का प्रबंधन नाथ ( स्वामी) बनकर करें।

'तुलसीदास सदा हरि चेरा।

कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥'